रविवार, 9 नवंबर 2025

Thornthwaite’s Classification of Climate

थॉर्नथवेट की जलवायु वर्गीकरण प्रणाली (Thornthwaite’s Classification of Climate)

परिचय (Introduction):

थॉर्नथवेट (C.W. Thornthwaite) एक अमेरिकी भूगोलवेत्ता और जलवायुविज्ञानी थे जिन्होंने 1931 तथा 1948 में जलवायु वर्गीकरण की नई पद्धति प्रस्तुत की।

उनकी पद्धति को "Potential Evapotranspiration (P.E.)" और "Moisture Index" पर आधारित जलवायु वर्गीकरण कहा जाता है।

यह वर्गीकरण जल की उपलब्धता (Water Availability) और वनस्पति वृद्धि (Vegetation Growth) पर आधारित है, इसलिए इसे “जल संतुलन (Water Balance)” पद्धति भी कहा जाता है।


थॉर्नथवेट की पद्धति के प्रमुख आधार (Basis of Thornthwaite’s Classification):

थॉर्नथवेट ने जलवायु को वर्गीकृत करने के लिए निम्नलिखित कारकों को आधार बनाया—

1. वार्षिक वर्षा (Annual Rainfall)

2. तापमान (Temperature)

3. वाष्पोत्सर्जन (Evapotranspiration)

4. नमी सूचकांक (Moisture Index - Im)

मुख्य अवधारणा: नमी सूचकांक (Moisture Index - Im)

थॉर्नथवेट ने जलवायु वर्गीकरण के लिए एक गणितीय सूत्र दिया—

\text{Im} = 100 \times \frac{(P - PE)}{PE}

जहाँ,

P = वर्षा (Precipitation)

PE = संभावित वाष्पोत्सर्जन (Potential Evapotranspiration)

इस सूचकांक के आधार पर उन्होंने विभिन्न जलवायु प्रकार निर्धारित किए।


जलवायु के प्रमुख प्रकार (Major Climate Types by Thornthwaite):

थॉर्नथवेट ने नमी सूचकांक के आधार पर जलवायु को निम्न प्रकारों में बाँटा है—

क्रमांक जलवायु प्रकार नमी सूचकांक (Im) की सीमा विशेषताएँ

1 A – अत्यंत आर्द्र जलवायु (Perhumid) Im > 100 अत्यधिक वर्षा, सदाबहार वनस्पति

2 B₄ – आर्द्र (Humid) 80–100 घना वन क्षेत्र

3 B₃ – अर्ध-आर्द्र (Moist sub-humid) 60–80 उपोष्णकटिबंधीय क्षेत्र

4 B₂ – शुष्क अर्ध-आर्द्र (Dry sub-humid) 40–60 घास के मैदान

5 C₁ – अर्ध-शुष्क (Semi-arid) 20–40 मरुस्थलीय झाड़ियाँ

6 D – शुष्क (Arid) 0–20 मरुस्थल, बहुत कम वर्षा


थॉर्नथवेट (1948) का संशोधित वर्गीकरण:

1948 में थॉर्नथवेट ने अपने वर्गीकरण को संशोधित किया। इसमें उन्होंने तीन प्रमुख आधार लिए —

1. नमी की स्थिति (Moisture Index)

2. तापमान की स्थिति (Thermal Efficiency)

3. वर्षा वितरण (Seasonal Concentration of Rainfall)

इस प्रणाली में उन्होंने कुल 9 प्रमुख जलवायु क्षेत्रों को परिभाषित किया।


थॉर्नथवेट की जलवायु वर्गीकरण के लाभ (Advantages):

1. यह प्रणाली जल और ताप संतुलन (Water & Heat Balance) पर आधारित है।

2. यह वनस्पति और कृषि के अध्ययन के लिए उपयोगी है।

3. यह सांख्यिकीय (Quantitative) और वैज्ञानिक आधार पर आधारित है।

4. इसका प्रयोग कृषि मौसम विज्ञान (Agro-climatology) में व्यापक रूप से होता है।

थॉर्नथवेट की जलवायु वर्गीकरण की सीमाएँ (Limitations):

1. यह पद्धति जटिल गणनाओं पर आधारित है।

2. इसमें PE (Potential Evapotranspiration) का सही निर्धारण कठिन है।

3. यह स्थानीय भौगोलिक स्थितियों (Local Relief) को ध्यान में नहीं रखता।

4. उच्च अक्षांशों (High latitudes) में यह पद्धति उतनी प्रभावी नहीं है।

भारत में थॉर्नथवेट का उपयोग (Application in India):

भारत में इस पद्धति का उपयोग जलवायु क्षेत्रीयकरण (Climatic Regionalization) के लिए किया गया है।

उदाहरण के लिए—

केरल और उत्तर-पूर्व भारत → आर्द्र (Humid)

मध्य भारत → उप-आर्द्र (Sub-humid)

राजस्थान, गुजरात → अर्ध-शुष्क से शुष्क (Semi-arid to Arid)

 निष्कर्ष (Conclusion):

थॉर्नथवेट का जलवायु वर्गीकरण एक वैज्ञानिक, जल संतुलन-आधारित प्रणाली है जो जल की उपलब्धता और वनस्पति के बीच संबंध को स्पष्ट करती है।

यह पद्धति आज भी कृषि योजना, पर्यावरणीय अध्ययन और भूगोल के जलवायुविज्ञान में अत्यंत उपयोगी मानी जाती है।


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